आधी रात का बंद कमरा
उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव इतना शांत था कि रात के समय हवा की आवाज़ भी साफ सुनाई देती थी। लेकिन उस गाँव की शांति के पीछे एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके बारे में बुज़ुर्ग आज भी बात करने से डरते थे गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी। लोग उसे "काली हवेली" कहते थे। हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक भारी जंग लगा ताला लटका रहता था। सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली में कोई रहता नहीं था। फिर भी हर रात ठीक बारह बजे, हवेली की ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में पीली रोशनी दिखाई देती थी। गाँव वालों का कहना था कि वह रोशनी पिछले तीस सालों से हर रात जलती थी। लेकिन किसी ने कभी अंदर जाकर यह देखने की हिम्मत नहीं की कि आखिर वह रोशनी जलाता कौन है। एक अजीब चिट्ठी शहर में रहने वाला आरव इन बातों को सिर्फ गाँव की बनाई हुई कहानी मानता था। एक दिन उसे अपने दादाजी की मृत्यु की खबर मिली। आरव तुरंत देवगढ़ पहुँच गया। दादाजी का घर वही पुराना मकान था, जहाँ आरव बचपन में गर्मियों की छुट्टिया...